आदेश चौधरी बोले, “एक्टिंग ने लोगों को देखने और समझने का मेरा नजरिया बदल दिया”
मुंबई! अभिनेता आदेश चौधरी, जो इस समय ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ का हिस्सा हैं, का मानना है कि अलग-अलग किरदारों को निभाने के वर्षों के अनुभव ने उन्हें न सिर्फ एक कलाकार के तौर पर बेहतर बनाया है, बल्कि असल जिंदगी में लोगों और उनके व्यवहार को देखने का नजरिया भी बदल दिया है। उनके मुताबिक, अलग-अलग किरदारों में ढलने से उन्होंने लोगों के व्यवहार के पीछे छिपी भावनाओं और परिस्थितियों को समझना सीखा है।
आदेश कहते हैं, “एक्टिंग आपको जबरदस्ती सहानुभूति रखना सिखाती है। जब भी मैं किसी किरदार में जाता हूं, तो मुझे खुद से पूछना पड़ता है कि ‘वह ऐसा क्यों कर रहा है?’ सिर्फ यह नहीं कि ‘वह क्या कर रहा है।’ सालों से यह आदत मेरी असल जिंदगी में भी आ गई है। मैं अब एक बेहतर और धैर्यवान श्रोता बन गया हूं। मैं लोगों के व्यवहार पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उनके बैकग्राउंड, डर और उन अनकही वजहों के बारे में सोचता हूं, जो उनके व्यवहार के पीछे हो सकती हैं।”
अभिनेता का मानना है कि अलग-अलग व्यक्तित्वों को निभाने से उन्हें यह समझने में मदद मिली कि किसी इंसान को सिर्फ अच्छा या बुरा कहकर परिभाषित नहीं किया जा सकता। वह कहते हैं, “आपको एहसास होता है कि कोई भी इंसान सिर्फ ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ नहीं होता। हर कोई किसी न किसी चोट, उम्मीद या दबाव के आधार पर फैसले ले रहा होता है। इस समझ ने मुझे ज्यादा संवेदनशील और साथ ही ज्यादा ऑब्जर्वेंट बनाया है।”

दिलचस्प बात यह है कि उनके निभाए एक किरदार ने उन्हें खुद का आईना भी दिखाया। आदेश एक ऐसे शांत किरदार को याद करते हैं, जो अपनी भावनाओं को अपने अंदर दबाकर रखता था और आखिरकार वे भावनाएं उस पर हावी हो जाती हैं। उस किरदार को निभाते हुए आदेश को अपनी एक आदत का एहसास हुआ।
वह बताते हैं, “मैंने एक बार ऐसा किरदार निभाया था, जो बहुत शांत था, कभी अपनी भावनाएं जाहिर नहीं करता था और सब कुछ अपने अंदर रखता था, जब तक कि वह उसे तोड़ न दे। उसे निभाते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं भी कभी-कभी ऐसा करता हूं। मेरी आदत है कि सब ठीक न होने के बावजूद शांति बनाए रखने के लिए कह देता हूं, ‘मैं ठीक हूं।’ उस किरदार ने मुझे मेरा आईना दिखाया।”
इस एहसास के बाद उन्होंने अपने आसपास के लोगों के साथ ज्यादा खुलकर बात करना शुरू किया। आदेश कहते हैं, “उसके बाद मैंने अपनी टीम, अपने परिवार और खुद के साथ ज्यादा ईमानदार होना शुरू किया। यह असहज था, लेकिन बहुत जरूरी भी था।”
आदेश के लिए नैतिक रूप से ग्रे किरदार सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से हैं। उनका मानना है कि ऐसे किरदारों को निभाने के लिए अभिनेता को उनके फैसलों को जज किए बिना उनकी सोच और परिस्थितियों को समझना पड़ता है।
वह कहते हैं, “जो किरदार मुझे सबसे ज्यादा चुनौती देते हैं, वे नैतिक रूप से ग्रे होते हैं। ऐसे किरदार जो गलत काम कर रहे होते हैं, लेकिन उनके पास अपने हिसाब से उन कामों को सही ठहराने की वजह होती है। ऐसे किरदार को निभाना मुश्किल होता है, क्योंकि आप उसे जज नहीं कर सकते। आपको उसकी सोच और उसके लॉजिक के भीतर रहना पड़ता है, भले ही वह आपकी सोच से बिल्कुल अलग क्यों न हो।”
ऐसे किरदारों का असर निजी जिंदगी पर भी पड़ सकता है। आदेश कहते हैं, “मेरे लिए यह व्यक्तिगत तौर पर मुश्किल होता है, क्योंकि उस किरदार का भारीपन घर तक साथ आ जाता है। आप खुद से सवाल करने लगते हैं कि क्या कुछ परिस्थितियों में मैं भी ऐसा बन सकता हूं? यह आत्ममंथन थका देने वाला होता है, लेकिन यही आपको आगे बढ़ने में भी मदद करता है।”
भावनात्मक रूप से गहरे किरदारों के बारे में बात करते हुए आदेश मानते हैं कि कैमरा बंद होने के बाद भी किरदार का कुछ हिस्सा उनके साथ रह जाता है। इसलिए उन्होंने खुद को किरदार से अलग करने के लिए एक तय प्रक्रिया बनाई है।
वह बताते हैं, “कुछ असर हमेशा रह जाता है, खासकर तब जब किरदार दुख, गुस्से या किसी ट्रॉमा से गुजर रहा हो। मेरे लिए किरदार से अलग होना एक बहुत सोच-समझकर किया जाने वाला प्रोसेस है। सबसे पहले मैं खुद को शारीरिक तौर पर बदलता हूं—चेहरा धोता हूं, कपड़े बदलता हूं और सेट पर लोगों से सामान्य चीजों के बारे में बात करता हूं।”
काम के बाहर की उनकी जिंदगी भी इस संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। वह कहते हैं, “इसके बाद काम के बाहर मेरी कुछ रूटीन हैं—जिम, न्यूट्रिशन, पढ़ना और करीबी लोगों से बात करना। न्यूट्रिशन में मेरा बैकग्राउंड और अब साइकोलॉजी की पढ़ाई भी इसमें मेरी मदद करती है। मैं खुद को याद दिलाता हूं, ‘वह एक किरदार था, और यह मैं हूं।’ लेकिन मैं सब कुछ मिटाना भी नहीं चाहता। अगर उस किरदार की थोड़ी-सी सच्चाई मेरे साथ रहकर मुझे एक बेहतर इंसान बनाती है, तो मुझे उससे कोई परेशानी नहीं है।”
वह याद करते हैं, “शुरुआत में मुझे स्क्रीन पर बोरिंग लगने का बहुत डर था। मुझे लगता था कि मैं ‘काफी’ नहीं हूं। इसलिए मैं हर चीज जरूरत से ज्यादा करने लगा था। एक निर्देशक ने मुझे अलग ले जाकर कहा, ‘परफॉर्म करना बंद करो। बस रहो।’ यह मेरे लिए अब तक का सबसे मुश्किल नोट था।”
आदेश के मुताबिक, उस सलाह ने उन्हें ठहराव पर भरोसा करना और अभिनय को ज्यादा स्वाभाविक तरीके से अपनाना सिखाया। वह कहते हैं, “इसका मतलब था कि आपको अपने ठहराव पर भरोसा करना होगा। इस बात पर भरोसा करना होगा कि अगर आप सच्चे हैं, तो दर्शक खुद आपकी तरफ आएंगे। इसने मुझे अपनी उस असुरक्षा का सामना करने के लिए मजबूर किया कि पसंद किए जाने के लिए मुझे ज्यादा कुछ करने की जरूरत है। उस अनुभव ने मुझे संयम सिखाया और आज मैं जिस तरह हर किरदार को अप्रोच करता हूं, उसे पूरी तरह बदल दिया।”
समय के साथ उनके लिए एक अच्छी परफॉर्मेंस की परिभाषा भी काफी बदल गई है। जहां शुरुआत में वह बड़े इमोशंस, दमदार डायलॉग्स और कैमरे पर अच्छा दिखने को अच्छी परफॉर्मेंस मानते थे, वहीं अब उनके लिए सच्चाई सबसे ज्यादा मायने रखती है।
आदेश कहते हैं, “जब मैंने शुरुआत की थी, तो मुझे लगता था कि अच्छी परफॉर्मेंस का मतलब बड़े इमोशंस, अच्छे डायलॉग्स और कैमरे पर अच्छा दिखना है। अब मुझे लगता है कि अच्छी परफॉर्मेंस तब होती है, जब लोग भूल जाएं कि आप एक्टिंग कर रहे हैं। जब वे किरदार पर इतना विश्वास करें कि उन्हें आपकी मेहनत दिखाई ही न दे।”
उनके लिए अब सबसे बड़ा लक्ष्य दर्शकों का ध्यान अभिनेता की तरफ खींचना नहीं, बल्कि उन्हें किरदार और कहानी पर विश्वास करवाना है। वह कहते हैं, “यह दिखावे की नहीं, सच्चाई की बात है। यह सुनने, प्रतिक्रिया देने और उस पल में पूरी तरह मौजूद रहने के बारे में है। यह कहानी की सेवा करने के बारे में है, अपने अहंकार की नहीं। मेरा लक्ष्य ‘मुझे देखो’ से बदलकर ‘उस पर विश्वास करो’ हो गया है। मेरे लिए यही सबसे बड़ा बदलाव है।”

