महाराणा प्रताप की 486वीं जयन्ती श्री राजपूत सभा भवन में मनाई गई
जयपुर, दिनांक 17 जून। प्रतिवर्ष की भांति आज श्री राजपूत सभा, जयपुर के तत्वाधान में अपराह्न 04:00 बजे श्री राजपूत सभा भवन में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयन्ती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर कार्यक्रम की शुरुआत महाराणा प्रताप के छायाचित्र पर दीप प्रज्वलन और पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। समारोह में उपस्थित वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के जीवन चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें देश के स्वाभिमान और अस्मिता का अमर प्रतीक बताया। कई वक्ताओं ने जयपुर में महाराणा प्रताप की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की मांग दोहराई, साथ ही भविष्य में सभी संगठनों के साथ मिलकर व्यापक स्तर पर एक मंच से महाराणा प्रताप जयंती मनाने की श्री राजपूत सभा से पुरजोर अपील की। वक्ताओं ने वर्ष 1576 के ऐतिहासिक हल्दीघाटी युद्ध, महाराणा के प्रिय अश्व ’चेतक’ की अद्वितीय स्वामिभक्ति और अरावली की पहाड़ियों में भील भाइयों को संगठित कर ’छापामार युद्ध प्रणाली’ के जरिए शक्तिशाली मुगल सेना के दांत खट्टे करने जैसी कुशल सैन्य रणनीतियों का भी स्मरण किया, जो उनके अद्वितीय जन-नायक होने को दर्शाती हैं।
सभाध्यक्ष राम सिंह चंदलाई ने सर्वप्रथम महाराणा प्रताप को नमन करते हुए कहा कि महाराणा प्रताप के विराट व्यक्तित्व को किसी धर्म, जाति या प्रदेश की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उन्हें 36 कौमों का स्नेह प्राप्त था। वे एक ऐसे राष्ट्र नायक थे जिनकी गौरव गाथा समस्त संसार में विख्यात है। उनके जीवन संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए आपने कहा कि वे जीवन पर्यन्त स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाले महान योद्धा व महापुरुष थे, जिनकी जीवन गाथा आज की युवा पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा स्रोत है। महाराणा प्रताप के स्वतंत्रता प्रेम और आदर्शों को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
महामंत्री धीर सिंह शेखावत ने महाराणा प्रताप के जीवन चरित्र और उनके सर्वश्रेष्ठ आदर्शों को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका जीवन महलों के सुख-वैभव को त्याग कर मातृभूमि की रक्षा के लिए जंगलों में संघर्ष करने की एक अमर गाथा है। उन्होंने विदेशी दासता स्वीकार करने के बजाय घास की रोटियां खाना स्वीकार किया, लेकिन मेवाड़ का शीश कभी झुकने नहीं दिया। महाराणा प्रताप केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्च नैतिक मूल्यों के धनी थे, जिन्होंने युद्ध भूमि में भी कभी मर्यादा नहीं छोड़ी। जब कुंवर अमर सिंह ने मुगल सेनापति के परिवार की महिलाओं को बंदी बना लिया था, तब महाराणा ने इसे अपनी संस्कृति के खिलाफ मानकर उन्हें पूरे सम्मान के साथ वापस भिजवाया था। उनके इसी अद्वितीय और उच्च चरित्र के कारण उनके शत्रु भी उनके प्रति सदैव आदर का भाव रखते थे।
इस अवसर पर अध्यक्ष राम सिंह चन्दलाई, उपाध्यक्ष प्रताप सिंह राणावत, महामंत्री धीर सिंह शेखावत, सहमंत्री पृथ्वी सिंह कालीपहाडी, कोषाध्यक्ष प्रधुमन सिंह मूण्डरू कार्यकारिणी सदस्य अभय सिंह हाथोज, गजराज सिंह कैलाई, (ऐडवोकेट), डॉ. सुमन कंवर बाबरा, श्री राजपूत सभा जिला ईकाई जयपुर शहर अध्यक्ष महेन्द्र प्रताप सिंह श्योदानपुरा, उपाध्यक्ष जितेन्द्र सिंह हिरनोदा, संगठन मंत्री लक्षमण सिंह गोगटीया, मानसरोवर जिला ईकाई अध्यक्ष बहादुर सिंह शेखावत, हेम सिंह त्रिलोकपुरा श्री राजपूत सभा जयपुर शहर ईकाई वॉर्ड (45) अध्यक्ष, गिरिराज सिंह बाबरा, अर्जुन सिंह हाथोज, महेन्द्र सिंह सोलंकी, रघुवीर सिंह गुगलकोटा एवं समाज के गणमान्य लोग उपस्थित हुए।
कार्यक्रम का संचालन महामन्त्री धीर सिंह शेखावत ने किया तथा अंत में सभाध्यक्ष राम सिंह चंदलाई ने उपस्थित सभी आगंतुकों व समाज बंधुओं को धन्यवाद ज्ञापित किया ।

